गंगोलीहाट से कौसानी के अनाशक्ति आश्रम और अल्मोड़ा होते हुए घर वापसी—आस्था, प्रकृति और अविस्मरणीय यादों का सफ़र।
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Gangolihat, Uttarakhand 9 min read Dr. S. D. Pant 21 views
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गंगोलीहाट से कौसानी के अनाशक्ति आश्रम और अल्मोड़ा होते हुए घर वापसी—आस्था, प्रकृति और अविस्मरणीय यादों का सफ़र।

Published 22 Oct 2026

गंगोलीहाट से अनासक्ति आश्रम तक — अनासक्ति का पहला पाठ

माँ कालिका के दर्शन करके मन कुछ ऐसा शांत हुआ कि लगा अब संसार से मोह ही समाप्त हो गया है।
मैं, मयंक और मामा—हम तीनों मित्र गंगोलीहाट से आगे बढ़े और हमारा अगला पड़ाव था कौसानी का अनासक्ति आश्रम, जहाँ कभी महात्मा गांधी ठहरे थे।
रास्ते में मामा बड़े गंभीर होकर बोले—
“आज गांधीजी की धरती पर जा रहे हैं। वहाँ जाकर मनुष्य को अपने भीतर झाँकना चाहिए।”
मयंक ने गाड़ी चलाते हुए कहा—
“पहले आप सामने देखिए, भीतर बाद में झाँक लेना। नहीं तो हम तीनों को भीतर ही भीतर कहीं और जाना पड़ जाएगा!”
मैंने कहा—
“यही तो जीवन का सत्य है मामा—मनुष्य को आत्मनिरीक्षण भी करना चाहिए और सड़क निरीक्षण भी।”
तीनों हँस पड़े।
कौसानी पहुँचे तो शाम धीरे-धीरे पहाड़ों के पीछे उतर रही थी। हम अनासक्ति आश्रम पहुँचे। वहाँ का वातावरण अचानक हमारी हँसी को भी कुछ देर के लिए शांत कर गया।आश्रम में गांधीजी से जुड़ी स्मृतियों को देखते हुए लगा कि यह स्थान केवल ईंट-पत्थर का भवन नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता-संग्राम की एक जीवित स्मृति है। गांधीजी ने यहाँ रहकर अनासक्ति योग पर चिंतन किया था।
मैंने मन ही मन सोचा—
“जिस व्यक्ति ने हमें सिखाया कि कर्म करो, लेकिन उसके फल के प्रति आसक्त मत हो… आज उसी के आश्रम में हम तीनों अपने-अपने कर्मों का फल लेकर घूम रहे हैं।”
मामा ने पूछा—
“क्या सोच रहे हो?”
मैंने कहा—
“गांधीजी को नमन कर रहा हूँ।”
मयंक बोला—
“और मैं सोच रहा हूँ कि होटल कब पहुँचेंगे।”
मैंने उसे घूरकर देखा।
वह बोला—
“भाई, यह भी अनासक्ति ही है। आश्रम से आसक्ति छोड़कर होटल की ओर बढ़ना!”
हम फिर हँस पड़े।
हमने गांधीजी की स्मृतियों के सामने सिर झुकाया और उस महापुरुष को नमन किया, जिसने अहिंसा, सत्य और आत्मसंयम के माध्यम से स्वतंत्र भारत की नींव को आकार देने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
सूर्य अब अस्ताचल की ओर जा चुका था।
हमने भी तय किया कि अब दर्शन और दर्शनशास्त्र दोनों को थोड़ी देर विश्राम दिया जाए।
होटल पहुँचे तो दिनभर की थकान जैसे दरवाजे पर ही उतर गई।
मामा ने कहा—
“आज का दिन बड़ा आध्यात्मिक रहा।”
मयंक बोला—
“हाँ, अब आध्यात्मिकता को थोड़ा पंजाबी संगीत चाहिए।”
और फिर जो हुआ, वह शायद गांधीजी की अनासक्ति की हमारी अपनी व्याख्या थी।
थोड़ा सुरापान हुआ, फिर संगीत चला—कभी पंजाबी, कभी गढ़वाली।
कुछ ही देर में जो तीन व्यक्ति शाम तक दर्शन, अध्यात्म और राष्ट्रनिर्माण पर चर्चा कर रहे थे, वे तीनों कमरे में ऐसे नाच रहे थे जैसे भारत की स्वतंत्रता अभी-अभी मिली हो।
मामा ने गढ़वाली गीत पर ऐसा नृत्य किया कि मयंक ने कहा—
“मामा, यह नृत्य है या स्वतंत्रता आंदोलन का अंतिम चरण?”
मैंने तुरंत कहा—
“चुप रह! यह अनासक्ति नृत्य है। इसमें शरीर नाचता है और आत्मा फल की चिंता नहीं करती।”
मामा ने भी पलटकर कहा—
“तुम दोनों को देखकर लगता है कि आत्मा तो बहुत पहले शरीर छोड़ चुकी है।”
कमरे में ठहाका गूँज गया।
फिर शुरू हुआ व्यंग्य-युद्ध।
हम तीनों एक-दूसरे की पुरानी आदतों, बोलने के ढंग, चाल-ढाल और यात्रा की छोटी-छोटी घटनाओं पर ऐसे तीखे व्यंग्य करने लगे कि यदि कोई बाहर से सुनता तो समझता कि तीनों जन्म-जन्मांतर के शत्रु हैं।
लेकिन मित्रता की यही तो खूबसूरती है—
जहाँ पराये व्यक्ति की बात चुभती है, वहीं मित्र की वही बात हँसा देती है।
रात बढ़ती गई। गीत बदलते गए। नृत्य की गुणवत्ता गिरती गई और आत्मविश्वास बढ़ता गया।
अंत में मयंक ने कहा—
“आज हमने गांधीजी की अनासक्ति समझ ली।”
मैंने पूछा—
“कैसे?”
वह बोला—
“न नृत्य की चिंता, न सुर की चिंता, न ताल की चिंता… बस कर्म करते जाओ!”
मामा ने तुरंत सुधार किया—
“और फल?”
मयंक बोला—
“फल की चिंता सुबह करेंगे… जब सिर दर्द होगा!”
तीनों फिर हँस पड़े।
उस रात कौसानी की ठंडी हवा बाहर बह रही थी और भीतर हमारी दोस्ती की गर्माहट थी।
दिन की शुरुआत माँ कालिका के दर्शन से हुई थी, बीच में गांधीजी के सत्य और अनासक्ति का स्मरण हुआ और रात मित्रता, संगीत, व्यंग्य और ठहाकों में बीती।
शायद यही यात्रा का असली आनंद था—
तीर्थ ने मन को शांत किया, गांधीजी ने विचार को छुआ और मित्रों ने जीवन को फिर से हँसना सिखा दिया।
और अनासक्ति का हमारा अंतिम सिद्धांत यही निकला—
“जो मिल जाए उसका आनंद लो, जो न मिले उसे छोड़ दो… और अगर मित्र मिल जाएँ तो फिर हँसते-हँसते पूरी रात भी छोड़ सकते हो!”
कौसानी की हसीन वादियों को अलविदा कहकर हम तीन मुसाफ़िरअगली सुबह अल्मोड़ा की ओर चल पड़े। रास्ते भर हँसी-मज़ाक और पहाड़ों की खूबसूरती का आनंद लेते हुए हम शाम को अल्मोड़ा पहुँचे। कुछ देर प्राकृतिक दृश्यों को निहारने के बाद रात बिताई और अगली सुबह निकल पड़े अल्मोड़ा के मशहूर लाल बाज़ार की सैर पर।
लाल बाज़ार की रौनक देखते हुए अचानक याद आया कि घर पर हमारी माताश्री हमारा इंतज़ार कर रही होंगी। लिहाज़ा, हमने अपनी-अपनी माताओं के लिए सूट खरीदने का विचार बनाया और एक दुकान में जा पहुँचे।
अब यहाँ से शुरू हुआ असली रोमांच!
मामा जी सूट के रंग, डिज़ाइन और कपड़े की गुणवत्ता पर गंभीर चर्चा कर रहे थे। उनका पूरा ध्यान इस बात पर था कि घर पहुँचकर उनकी धर्मपत्नी को कौन-सा सूट पसंद आएगा।
उधर, पंत जी और मयंक की नज़रें दुकान में मौजूद कुछ सुंदर युवतियों पर जा टिकीं।
मामा जी सूट देख रहे थे और हम दोनों नज़ारे!
मामा जी ने एक सूट उठाकर पूछा, "भाई, ये कैसा है?"
मैंने तुरंत कहा, "बहुत बढ़िया है ! एकदम शानदार!"
मयंक ने भी हामी भरी, "हाँ मामा जी, यही ले लीजिए!"
अब मामा जी को क्या पता कि हमारी नज़र सूट पर कम और दुकान के दूसरे आकर्षणों पर ज़्यादा थी!
मामा जी बोले, "तुम दोनों सूट खरीदने आए हो या यहाँ टाइमपास करने?"
मैंने कहा, "मामा जी, माँ के लिए सूट तो खरीद ही रहे हैं, लेकिन इंसान को खरीदारी के साथ थोड़ा ज्ञान भी अर्जित करना चाहिए!"
मयंक बोला, "बिल्कुल! आखिर अल्मोड़ा की संस्कृति को समझना भी तो हमारी ज़िम्मेदारी है!"
मामा जी ने घूरकर देखा और कहा, "तुम दोनों की संस्कृति मैं अच्छी तरह समझ रहा हूँ!"
बस, फिर क्या था! दुकान में ही हँसी का माहौल बन गया।
ख़ैर, सूट खरीदे गए। मामा जी ने अपनी धर्मपत्नी के प्रति कर्तव्य निभाया और हमने अपनी-अपनी माताओं के प्रति।
लेकिन सच कहें तो उस दिन सूट की खरीदारी से ज़्यादा हमारी नज़रें अपनी पसंद के नज़ारों पर टिकी थीं!
हम तीनों अल्मोड़ा से अपने घर थलीसैंण की ओर रवाना हुए। पहाड़ी रास्ते, ठंडी हवा और सफ़र की मस्ती अपने पूरे रंग में थी।
कुछ दूर चलने के बाद मयंक ने मेरी तरफ़ देखा और पूछा—
मयंक: "पंत जी, क्या सोच रहे हो? अर्ज़ हो जाए कुछ!"
मैंने मुस्कुराकर कहा, "भाई, सोच तो बहुत कुछ रहा हूँ, मगर तुम सुनने के लिए तैयार हो?"
मामा: "तुम दोनों शुरू हो जाओ, बस रास्ता मत भुला देना अपनी शायरी के चक्कर में!"
मैंने कहा, "भाई, सुबह से अल्मोड़ा की खूबसूरती देख रहे थे। अब घर लौटते हुए कुछ शायरी हो जाए। अगर हम भी इश्क़ करते, तो शायद कुछ यूँ करते!"
और फिर मुझे जौन एलिया की ग़ज़ल याद आ गई।

मैंने गुनगुनाना शुरू किया—
तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो,
जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो।
मैं तुम्हारे ही दम से ज़िंदा हूँ,
मर ही जाऊँ जो तुम से फ़ुर्सत हो।
तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू,
और उतनी ही बे-मुरव्वत हो।
तुम हो पहलू में पर क़रार नहीं,
या'नी ऐसा है जैसे फ़ुर्क़त हो।
तुम हो अंगड़ाई रंग-ओ-निकहत की,
कैसे अंगड़ाई से शिकायत हो।
किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ,
तुम मिरी ज़िंदगी की आदत हो।
किस लिए देखती हो आईना,
तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो।
दास्ताँ ख़त्म होने वाली है,
तुम मिरी आख़री मोहब्बत हो।
— जौन एलिया

ग़ज़ल ख़त्म हुई तो कुछ पल के लिए गाड़ी में ख़ामोशी छा गई।
फिर मयंक बोला—
मयंक: "पंत जी, बात तो बड़ी गहरी है! लेकिन एक बात बताओ, ये मोहब्बत हुई कब? हमें तो तुमने कभी बताया नहीं!"
मैंने हँसते हुए कहा, "भाई, हर बात बताकर थोड़ी की जाती है! कुछ बातें दिल में ही अच्छी लगती हैं।"
मामा: "अच्छा! तो अल्मोड़ा में सूट हम खरीद रहे थे और इश्क़ तुम दोनों कर रहे थे?"
मैंने कहा, "मामा जी, इश्क़ करने के लिए भी नसीब चाहिए। फिलहाल तो हम शायरी से ही काम चला रहे हैं!"
मयंक बोला, "और अगर नसीब ने साथ नहीं दिया तो?"
मैंने कहा, "तो भाई, जौन एलिया की ग़ज़लें सुनेंगे और घर जाकर माँ को सूट दिखाएँगे!"
मामा जी ने तुरंत कहा, "हाँ, और अगर सूट पसंद नहीं आया तो फिर तुम्हारी असली ग़ज़ल शुरू होगी!"
तीनों ज़ोर से हँस पड़े।
कुछ देर बाद सफ़र आगे बढ़ा। पहाड़ों के मोड़ आते रहे और हमारी बातें भी चलती रहीं।
अचानक मुझे एक और ग़ज़ल याद आई। मैंने कहा—
पंत जी: "भाइयों, सुनो! एक और शायरी याद आ गई। ये भी सुन लो!"
मयंक: "लो भाई, अब कौन-सी मोहब्बत अधूरी रह गई?"
मैंने कहा, "इस बार मोहब्बत से ज़्यादा तन्हाई और किताबों का मामला है!"
और फिर जॉन के नाम से मशहूर इन अल्फ़ाज़ को गुनगुनाने लगा—

तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे,
मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं।
मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें,
मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं।
इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर,
इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन।
मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता,
ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता।
जॉन

इसी तरह कभी जौन एलिया की ग़ज़ल, और कभी हमारी अपनी बेवक़ूफ़ियों पर हँसते-हँसते सफ़र कटता गया।
रास्ते के मोड़ बदलते रहे, पहाड़ पीछे छूटते रहे और शाम धीरे-धीरे रात में बदल गई। लेकिन हमारी महफ़िल का रंग कम नहीं हुआ।
पता ही नहीं चला कि कब थलीसैंण पहुँच गए और कब हम तीनों अपने-अपने घरों की ओर निकल पड़े।

उस दिन महसूस हुआ कि सफ़र की असली ख़ूबसूरती सिर्फ़ मंज़िल में नहीं होती। दोस्तों की हँसी, शायरी के अल्फ़ाज़ और मामूली-सी बात भी ज़िंदगी की सबसे ख़ास याद बन जाती है।
और अंत में, घर पहुँचने से पहले मेरे ज़ेहन में ये पंक्तियाँ गूँज उठीं—

जो नशे सस्ते हैं, उनमें एक याराना भी है,
इश्क़ महँगा शौक़ है और उसमें जुर्माना भी है।
उससे मिलने जाते-जाते रुक गया ये सोचकर,
सिर्फ़ जाना ही नहीं, लौटकर आना भी है।
अज्ञात

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