प्रेम में स्वर्ग की चाह थी, पाताल भुवनेश्वर पहुँच गए!
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Patal Bhuvaneshwar, Uttarakhand 7 min read Sunil Dutt Pant 11 views
A journey remembered

प्रेम में स्वर्ग की चाह थी, पाताल भुवनेश्वर पहुँच गए!

Published 18 Oct 2026

तीन यार और एक अदृश्य यात्री
थलीसैंण से पाताल भुवनेश्वर तक—मस्ती, मोहब्बत और अद्वैत की यात्रा
सुबह के पाँच बज रहे थे।
थलीसैंण की पहाड़ियों पर धुंध ऐसे पसरी थी, जैसे रात ने अभी अपना बिस्तर समेटा ही न हो। दूर मंदिर की घंटी बज रही थी और हमारी गाड़ी का हॉर्न उससे मुकाबला कर रहा था।
“पों!!!”
मैंने गाड़ी का दरवाजा खोला—
“मामा! उठो!”
अंदर से आवाज आई—
“पाँच मिनट…”
मयंक बोला—
“पंत जी, आध्यात्मिक यात्रा शुरू होने से पहले मामा मोह-माया की नींद में समाधिस्थ हैं।”
अंदर से मामा की आवाज आई—
“और तुम दोनों मेरी समाधि भंग करने वाले असुर हो!”
बस, यहीं से हमारी यात्रा शुरू हो गई।
हम तीन दोस्त—पंत जी, मामा और मयंक—थलीसैंण से अल्मोड़ा की ओर निकल पड़े।
हमारा कार्यक्रम था—गोलू देवता, जागेश्वर, पाताल भुवनेश्वर, सोनी-बिनसर और अंत में कौसानी का गांधी अनाशक्ति आश्रम।
हम भगवान को खोजने निकले थे।
हालाँकि मामा की प्राथमिकता सूची में भगवान से पहले नाश्ता था।
अल्मोड़ा और आधुनिक आध्यात्मिकता

अल्मोड़ा पहुँचते ही पहाड़ की ठंडी हवा ने हमारा स्वागत किया।

एक तरफ पुराने मंदिर, दूसरी तरफ आधुनिक कैफे।

मयंक ने कहा—

“पंत जी, देखो—भारत बदल रहा है। सुबह मंदिर, दोपहर कॉफी, शाम इंस्टाग्राम और रात आत्मचिंतन।”

मामा बोले—
“और आत्मचिंतन से पहले खाना।”

मैंने कहा—
“मामा, शरीर नश्वर है।”

मामा बोले—
“इसलिए तो समय रहते खिला दो!”

हम तीनों हँस पड़े।

तभी सामने पहाड़ों पर उतरती धूप को देखकर मेरे भीतर किसी पुराने संत की आवाज-सी गूँजी—

“मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।” — कबीर

मैंने कहा—
“शायद आधुनिक आध्यात्मिकता का अर्थ यही है—मंदिर में सिर झुकाना, कैफे में बैठकर मन को सुनना और जीवन की भागदौड़ के बीच अपने भीतर की रोशनी को बचाए रखना।”

मयंक बोला—
“मतलब कॉफी भी ध्यान हो सकती है?”

मामा ने तुरंत कहा—
“अगर उसके साथ पकौड़े हों, तो वह पूर्ण ध्यान है।”

हम फिर हँस पड़े।

लेकिन उस हँसी के पीछे एक गहरी बात छिपी थी—समय बदलता है, साधन बदलते हैं, पर मनुष्य की भीतर लौटने की इच्छा कभी नहीं बदलती।

कबीर की पंक्तियाँ जैसे पहाड़ों में घुल रही थीं—

“मोको कहाँ ढूँढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में।”

शायद ईश्वर मंदिर की घंटियों में भी था, कॉफी की भाप में भी, दोस्तों की हँसी में भी और उस क्षण की सहज शांति में भी।रात को खूब मस्ती हुई।

मामा बोले—
“कल सुबह जल्दी निकलना है- मंदिर।”

मयंक बोला—
“कितने बजे?”

“पाँच बजे।”

मैंने कहा—
“पाँच बजे उठेंगे।”

मामा ने गंभीर चेहरा बनाकर कहा—
“आध्यात्मिक यात्रा में अनुशासन बहुत जरूरी है।”

मैंने कहा—
“बिल्कुल।”

सुबह पाँच बजे अलार्म बजा।

मामा ने बंद कर दिया।

पाँच बजकर दस मिनट पर फिर बजा।

फिर बंद।

पाँच बजकर बीस मिनट पर मयंक ने कहा—

“मामा!”

अंदर से आवाज आई—

“आ रहा हूँ।”

मयंक बोला—

“पंत जी, ये ‘आ रहा हूँ’ वही है जो आत्मा जन्म-जन्मांतर से मोक्ष की ओर कह रही है।”

मैं हँस पड़ा।

आखिरकार मामा बाहर निकले।

आँखें आधी बंद।

बाल अस्त-व्यस्त।

चेहरे पर ऐसा भाव जैसे संसार से वैराग्य हो गया हो।

मयंक ने पूछा—
“मामा, क्या हुआ?”

मामा बोले—
“कुछ नहीं। बस शरीर संसार छोड़ना चाहता है, लेकिन तुम दोनों छोड़ने नहीं दे रहे।”

और हमारी यात्रा का गोलू मंदिर में प्रवेश
सुबह की पहली मंज़िल—गोलू देवता

पहाड़ की सुबह अद्भुत होती है।

ठंडी हवा।

चीड़ की खुशबू।

दूर से आती घंटियों की आवाज।

और सामने खुलते पहाड़।

हम गाड़ी में बैठे थे।

मयंक मोबाइल से वीडियो बना रहा था।

मैंने पूछा—
“क्या कर रहे हो?”

बोला—
“Travel vlog.”

मामा बोले—
“पहले travel कर ले, vlog बाद में बना लेना।”

मयंक—
“मामा, आजकल लोग यात्रा कम करते हैं, पोस्ट ज्यादा करते हैं।”

मैंने कहा—
“यही तो आधुनिक मनुष्य की समस्या है। अनुभव कम, documentation ज्यादा।”

मामा बोले—
“और documentation के बाद खाना।”

हम हँस पड़े।

गोलू देवता के मंदिर के पास पहुँचते ही वातावरण बदल गया।

चारों तरफ घंटियाँ।

लोगों की श्रद्धा।

मनोकामनाओं की चिट्ठियाँ।

मामा ने चिट्ठियों को देखा और बोले—
“लगता है गोलू देवता के यहाँ पूरा सरकारी कार्यालय चलता है।”

मयंक बोला—
“हाँ, बस यहाँ file जल्दी move होती होगी।”

मैंने कहा—
“यहाँ आदमी अपनी इच्छा लिखकर भगवान को देता है।”

मामा बोले—
“तो हम भी देंगे।”

हम तीनों ने तीन चिट्ठियाँ लीं।
चिट्ठी लिखने ही वाले थे कि अचानक मयंक की नजर सामने गई।
वहाँ एक बेहद सुंदर युवती खड़ी थी।
मयंक कुछ सेकंड के लिए बिल्कुल शांत हो गया।
मैंने कहा—
“क्या हुआ?”
मयंक बोला—
“कुछ नहीं…”
मामा ने पूछा—
“फिर चिट्ठी क्यों नहीं लिख रहा?”
मयंक बोला—
“सोच रहा हूँ… गोलू देवता को क्या लिखूँ।”
मामा मुस्कुराए—
“जो मन में है वही लिख।”
मयंक ने लड़की की तरफ देखा और बोला—
“मामा, लगता है गोलू देवता ने हमारी चिट्ठी लिखवाने से पहले ही दर्शन दे दिए।”
मैं हँसते-हँसते झुक गया।
मामा ने तुरंत ज्ञान देना शुरू किया—
“बेटा, सुंदरता को देखकर मन का विचलित होना मोह है।”
मयंक ने पूछा—
“और उसे देखकर मुस्कुराना?”
मामा बोले—
“वह… प्रकृति की प्रशंसा है।”
मयंक बोला—
“मामा, आपका ज्ञान परिस्थिति के अनुसार बदलता क्यों है?”
मामा—
“ज्ञान स्थिर है, व्याख्या गतिशील है।”
मैंने कहा—
“वाह! मामा आज तो Advaita का नया संस्करण लेकर आए हैं।”
मयंक ने मेरी ओर देखकर कहा—
“पंत जी, आप तो अद्वैत पढ़ते हैं। बताइए—वह और हम अलग कहाँ हैं?”
मैंने कहा—
“अद्वैत का अर्थ यह नहीं कि तुम जाकर उसके सामने बोल दो—‘तत्त्वमसि!’”
मामा जोर से हँस पड़े।
मयंक बोला—
“तो फिर क्या बोलें?”
मैंने कहा—
“पहले अपना परिचय देना सीखो, ब्रह्मज्ञान बाद में देना।”
तीनों हँसने लगे।
और तभी मुझे लगा—
शायद आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत भी ऐसी ही होनी चाहिए।
पहले मनुष्य को हँसना सीखना चाहिए।
जो आदमी हँस नहीं सकता, वह गंभीर तो हो सकता है, लेकिन शायद अभी आध्यात्मिक नहीं हुआ।अब हमने चिट्ठियाँ लिखनी शुरू कीं।

मामा ने कुछ लिखा।
मयंक ने कुछ लिखा।
मैंने भी अपने मन की बात कागज़ पर उतार दी।

मैंने दोनों से पूछा—
“क्या लिखा?”

मामा ने चिट्ठी मोड़ते हुए कहा—
“गोपनीय।”

मयंक भी मुस्कुराया—
“भगवान और मेरे बीच की बात है।”

मैंने कहा—
“अच्छा! भगवान से भी Secret?”

मामा बोले—
“भाई, कुछ बातें भगवान को बताने के लिए होती हैं, दोस्तों को नहीं।”

हम तीनों हँस पड़े।

लेकिन अगले ही क्षण उस हँसी के पीछे एक गहरी शांति उतर आई।

हमने अपनी-अपनी चिट्ठियाँ हाथ में लीं और गोलू देवता के चरणों में श्रद्धा से अर्पित कर दीं।

अब वे चिट्ठियाँ हमारी नहीं थीं।

जो माँगा था, वह भी हमारा नहीं रहा।

जो इच्छा थी, उसे भी हमने छोड़ दिया।

बस मन में एक भाव था—

“हे ईश्वर, जो हमारे लिए उचित हो, वही देना। हमारी इच्छाओं से अधिक अपनी इच्छा को महत्व देना।”

कुछ क्षण हम मौन खड़े रहे।

घंटियों की ध्वनि वातावरण में गूँज रही थी—

टनन्… टनन्…

ऐसा लगा जैसे हर घंटी भीतर से कह रही हो—

“छोड़ दो… समर्पित कर दो… भरोसा रखो।”

मैंने मन ही मन कहा—

“हे प्रभु, हम माँगने आए थे, लेकिन अब समझ आया कि सबसे बड़ी प्रार्थना माँगना नहीं, स्वयं को समर्पित कर देना है।”

मयंक ने धीरे से पूछा—

“पंत जी, अब?”

मैंने मुस्कुराकर कहा—

“अब जहाँ रास्ता ले जाए।”

मामा बोले—

“रास्ता तो ठीक है, लेकिन अगला पड़ाव कौन-सा है?”

मैंने कहा—

“जागेश्वर।”

मामा बोले—

“तो चलो, अब शिव के दरबार में चलते हैं।”

गाड़ी स्टार्ट हुई।

गोलू देवता की घंटियों की आवाज पीछे छूटने लगी।

सामने देवदारों से घिरा रास्ता था।

और हमारे भीतर एक नया भाव—

मनोकामना से समर्पण की ओर,
हँसी से मौन की ओर,
और गोलू देवता से महादेव की ओर।

हम अगले पड़ाव—

जागेश्वर धाम
की ओर चल पड़े।

तीन दोस्त थे, लेकिन उस क्षण ऐसा लग रहा था जैसे हमारे साथ कोई चौथा भी यात्रा कर रहा हो—

अदृश्य… मौन… और बिल्कुल हमारे भीतर।

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