सब व्यवस्था है। बात हो रखी है
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Bindeshwar Mahadev, Uttarakhand 14 min read Mayank Suyal 93 views
A journey remembered

सब व्यवस्था है। बात हो रखी है

Published 26 Aug 2026

उन दिनों मेरा काम थैलीसैंण से ही चल रहा था। पौड़ी गढ़वाल की सर्दियाँ वैसे भी आदमी को घर के भीतर रहने की सलाह देती हैं, लेकिन पहाड़ में रहने वाला आदमी मौसम की सलाह कितनी मानता है, यह अलग बात है। शुक्रवार का दिन था और हमारा बिंदेसर जाने का कार्यक्रम पहले से बना हुआ था। योजना यह थी कि समय से काम खत्म करूँगा, हम तीनों—मामा, डॉक्टर साहब और मैं—थैलीसैंण से पीठसैंण तक अपनी गाड़ी से जाएँगे और वहाँ से करीब सोलह किलोमीटर का रास्ता पैदल तय करके बिंदेसर पहुँचेंगे।

योजना बनाने में आदमी हमेशा समय का बड़ा मालिक होता है। उसे लगता है कि तीन बजे का काम दो बजे खत्म हो जाएगा, आधे घंटे का रास्ता बीस मिनट में कट जाएगा और सूर्य भी शायद उसके कार्यक्रम का सम्मान करते हुए कुछ देर बाद डूबेगा। असली जीवन इन बातों की कोई गारंटी नहीं देता।

उस दिन भी काम कुछ ऐसा उलझा कि निकलते-निकलते तीन बज गए।

मैंने जैसे-तैसे लैपटॉप बंद किया और बाहर आया। मामा और डॉक्टर साहब तैयार थे। मामा की निगाह देखकर ही मालूम हो गया कि देर का हिसाब मुझसे रास्ते में लिया जाएगा।

“अब आए हो?” मामा ने कहा, “इसी समय निकलना था तो सुबह से तैयारी किस बात की हो रही थी?”

मैं कुछ सफाई देता, उससे पहले डॉक्टर साहब ने बात काट दी।

“अब जो तीन बज गए, उन्हें वापस तो कर नहीं सकते। चलो।”

डॉक्टर साहब की एक खासियत थी—जिस समस्या का समाधान उनके मन में न हो, उसके बारे में ज्यादा सोचने में उनका विश्वास नहीं था। और जिस समस्या का समाधान उन्होंने सोच लिया हो, उसके बारे में दूसरों की राय सुनने में तो और भी कम।

हम तीनों गाड़ी में बैठे और पीठसैंण की तरफ चल पड़े।

करीब चार बजे हम पीठसैंण पहुँच गए। सर्दियों की शाम थी। धूप अभी पूरी तरह गई नहीं थी, लेकिन पहाड़ों के पीछे उतरने की तैयारी में थी। हवा में वह ठंडक आ चुकी थी जो आदमी को बिना घड़ी देखे बता देती है कि दिन अब ज्यादा देर का मेहमान नहीं है।

हमारे सामने आगे का सोलह किलोमीटर का पैदल रास्ता था।

अब समझदार आदमी ऐसी स्थिति में क्या करता?

शायद तुरंत चल पड़ता।

हमने क्या किया?

हम फोटो खिंचाने लगे।

किसी को कोई खास जल्दी उस समय महसूस नहीं हुई। कभी एक जगह खड़े हुए, कभी दूसरी जगह। कभी पहाड़ पीछे अच्छे आ रहे थे, कभी रोशनी ठीक नहीं लग रही थी। दस-पंद्रह मिनट के लिए शुरू हुआ यह कार्यक्रम कब लंबा हो गया, पता ही नहीं चला।

जब तस्वीरों से फुर्सत मिली तो उजाला भी हमसे लगभग फुर्सत ले चुका था।

मैंने कहा, “अब क्या करें? यहीं रुक जाते हैं। सुबह आराम से निकलेंगे।”

मामा भी इसी पक्ष में थे। वहाँ एक होटल जैसा ठिकाना था। हमारा पहले से भी यही विचार था कि अगर देर ज्यादा हो गई तो रात पीठसैंण में बिता लेंगे।

डॉक्टर साहब बोले, “मैं पता करके आता हूँ।”

वह होटल की ओर चले गए।

मैं और मामा बाहर उनका इंतजार करते रहे। हमारे मन में तो लगभग तय था कि आज यहीं रहना है। ठंड बढ़ रही थी, अँधेरा उतर रहा था और सामने सोलह किलोमीटर का जंगल था। निर्णय में बहुत गणित नहीं था।

थोड़ी देर बाद डॉक्टर साहब लौटे।

उनके चेहरे को देखकर मुझे आज भी शक होता है कि होटल के अंदर उन्होंने सचमुच रहने की व्यवस्था पूछी थी या केवल समय काटकर वापस आए थे।

आते ही बोले, “देखो, अब हमारे पास दो विकल्प हैं।”

हम दोनों उनकी तरफ देखने लगे।

“पहला—अभी बिंदेसर के लिए चल पड़ते हैं।”

“और दूसरा?” मामा ने पूछा।

डॉक्टर साहब ने बड़ी गंभीरता से कहा, “बीस मिनट यहाँ खड़े होकर बहस करते हैं और उसके बाद बिंदेसर के लिए चल पड़ते हैं।”

मैंने उनकी तरफ देखा।

मामा ने मेरी तरफ देखा।

उस क्षण हम दोनों को समझ आ गया कि डॉक्टर साहब होटल में कम और अपना निर्णय सुनाने अधिक गए थे।

मामा बोले, “जब जाना ही तय कर रखा था तो पूछने क्यों गए थे?”

डॉक्टर साहब मुस्कराए, “आप लोगों को संतोष देने के लिए।”

“और ऊपर रहने का क्या है?”

“सब व्यवस्था है। बात हो रखी है।”

यही वह वाक्य था जिस पर हमने उस रात अपनी सारी उम्मीदें रख दीं—

ऊपर सारी व्यवस्था है।

हमने गाड़ी वहीं छोड़ी, जरूरी सामान उठाया और चढ़ाई शुरू कर दी।

शुरुआत में अभी थोड़ा उजाला था। बातें करते हुए चलना आसान लग रहा था। मैं और मामा बीच-बीच में डॉक्टर साहब को उनकी जिद के लिए सुनाते जा रहे थे और डॉक्टर साहब ऐसे हँस रहे थे जैसे हमारी शिकायतें भी यात्रा के मनोरंजन का हिस्सा हों।

मामा बोले, “आराम से यहाँ रुक जाते। सुबह चलते। लेकिन नहीं! डॉक्टर साहब को आज ही जंगल नापना है।”

डॉक्टर साहब हँसे।

“अरे, अभी तो चले भी नहीं और थक गए?”

“थका कोई नहीं है,” मामा बोले, “बात अक्ल की हो रही है।”

मैं भी मामा के पक्ष में आ गया।

“और ऊपर अगर व्यवस्था नहीं मिली न, डॉक्टर साहब, तो आज सारी व्यवस्था आपकी होगी।”

डॉक्टर साहब ने इस बात का उत्तर देने के बजाय किसी पुरानी यात्रा का किस्सा शुरू कर दिया।

उनका यह भी अपना ढंग था। जब प्रश्न असुविधाजनक हो जाए तो उसका उत्तर देने की अपेक्षा कोई दूसरी कहानी सुना देना अधिक उपयोगी समझते थे।

थोड़ी देर बाद मामा अपनी कोई बात ले बैठे। फिर डॉक्टर साहब ने उन्हें टोका। फिर दोनों किसी पुरानी घटना पर बहस करने लगे। दोनों का रिश्ता ऐसा ही था—खट्टा भी, मीठा भी। मामा उम्र में बड़े थे, इसलिए डॉक्टर साहब को कभी भी कुछ सुना सकते थे। डॉक्टर साहब भी जवाब देने में पीछे नहीं रहते थे, मगर उनके जवाब की एक सीमा थी। नोक-झोंक कितनी भी हो जाए, मामा के लिए उनके भीतर का लिहाज कभी खत्म नहीं होता था।

मैं कभी इस तरफ हो जाता, कभी उस तरफ।

इसी बातचीत में रास्ता कटता गया।

कुछ दूर जाने के बाद वह जगह भी पीछे छूट गई जहाँ से नीचे की बस्तियों की रोशनियाँ दिखाई देती थीं। उसके आगे जंगल शुरू होता था—घना, शांत और रात में कुछ ज्यादा ही विशाल दिखाई देने वाला।

अब पूरा अँधेरा हो चुका था।

हमने मोबाइल की रोशनी निकाली ही थी कि डॉक्टर साहब ने अपने सामान से एक बड़ी-सी टॉर्च निकाल ली।

टॉर्च ऐसी कि देखते ही मैं और मामा दोनों कुछ क्षण चुप रहे।

फिर मैंने कहा, “अच्छा! तो तैयारी पहले से पूरी थी?”

मामा तुरंत बोले, “मैं तभी कह रहा था। इसे आज ऊपर जाना ही था। होटल-वोटल सब नाटक था।”

डॉक्टर साहब ने टॉर्च आगे की और ऐसे चलने लगे जैसे उन्होंने कुछ सुना ही न हो।

उस टॉर्च की रोशनी ने रास्ता बहुत आसान कर दिया था। आगे पगडंडी का एक टुकड़ा चमकता और हम उसी रोशनी के पीछे चलते जाते।

कुछ देर बाद फिर व्यवस्था की चर्चा छिड़ गई।

मामा ने कहा, “देख लेना, ऊपर जाकर अगर कुछ नहीं मिला तो तुम जानो।”

डॉक्टर साहब चलते-चलते हँसे।

“अरे, ऊपर सारी व्यवस्थाएँ हैं। पहले फिलहाल चल लो…”

फिर दो कदम चलकर जैसे बात याद आई हो, सहज भाव से बोले—

“वैसे यहाँ जानवर भी बहुत हैं… शेर-वेर, भालू…”

मामा ने उनकी ओर देखा।

मैंने पीछे जंगल की ओर।

डॉक्टर साहब टॉर्च लेकर आगे बढ़ चुके थे।

अब यह सलाह थी, तंज था या हमारे पैरों की रफ्तार बढ़ाने का उनका अपना तरीका—आज तक तय नहीं कर पाया हूँ। इतना जरूर है कि उसके बाद हममें से किसी ने रास्ते में बैठकर आराम करने की ज्यादा जिद नहीं की।

रात गहरी होती गई।

कहीं-कहीं हवा पेड़ों से टकराकर ऐसी आवाज करती कि आदमी पहले उसकी वजह खोजता और बाद में खुद को समझाता कि हवा ही है। फिर थोड़ी देर बातचीत शुरू हो जाती।

मामा कोई किस्सा सुनाते।

डॉक्टर साहब उसमें सुधार करते।

मामा कहते, “तुम हर बात में डॉक्टर मत बना करो।”

मैं हँसता।

और जंगल फिर थोड़ा कम डरावना लगने लगता।

कई घंटे इसी तरह चलते हुए निकल गए। आश्चर्य की बात यह है कि इतनी लंबी चढ़ाई के बावजूद हमें रास्ते का उतना बोझ महसूस नहीं हुआ जितना बाद में सोचकर होता है। शायद तीन लोगों की बातचीत भी रास्ते का सामान हल्का कर देती है।

रात करीब दस बजे हम बिंदेसर पहुँचे।

पहुँचकर सबसे पहले जो चीज मिली, वह थी—खामोशी।

जिस “सारी व्यवस्था” के भरोसे हम छह घंटे जंगल पार करके आए थे, उसका पहला दृश्य बड़ा प्रभावशाली था।

चारों तरफ अँधेरा।

दो-तीन छोटे-छोटे पहाड़ी घर।

न कोई आदमी।

न कोई आवाज।

न कोई खुला दरवाजा।

हम कुछ देर खड़े रहे।

फिर एक दरवाजा खटखटाया।

कोई जवाब नहीं।

दूसरा देखा।

वहाँ भी कुछ नहीं।

मैंने डॉक्टर साहब की तरफ देखा।

मामा ने भी डॉक्टर साहब की तरफ देखा।

कुछ क्षण पहले तक जो आदमी टॉर्च लेकर हमारा मार्गदर्शक था, अब उसी पर दो जोड़ी आँखें प्रश्न बनकर टिकी थीं।

मैंने कहा, “डॉक्टर साहब… ये हैं सारी व्यवस्थाएँ?”

मामा बोले, “कहाँ बात करके आए थे तुम?”

डॉक्टर साहब ने वही उत्तर दिया जो शायद उस समय उनके पास सबसे उपयोगी था—

“हो जाएगा, हो जाएगा।”

उस स्थिति में गुस्सा भी आ रहा था और हँसी भी।

रात के दस बजे थे। सर्दी हड्डियों तक पहुँच रही थी। वापस जाने का प्रश्न ही नहीं था। और जिस स्थान पर पहुँचकर हमें लगा था कि कोई हमारा इंतजार कर रहा होगा, वहाँ हमारे अलावा जैसे किसी को खबर ही नहीं थी कि तीन महान यात्री जंगल पार करके आ चुके हैं।

आखिर एक घर का दरवाजा किसी तरह खुला और हम अंदर चले गए।

अगली सुबह पता चला कि वह वहीं के पंडित जी का घर था।

उस वक्त हमें इतना ही मालूम था कि सिर पर छत मिल गई है।

अब दूसरी समस्या सामने थी—भूख।

किसी दूसरे आदमी के घर में रात को पहुँचे हों तो यह भी नहीं पता होता कि कौन-सी चीज कहाँ रखी है और किस चीज को हाथ लगाना उचित है। हम इधर-उधर देखते रहे।

डॉक्टर साहब खोज में लग गए।

कुछ देर बाद उन्होंने मानो कोई खजाना खोज लिया हो—

आलू।

बस।

उस रात संसाधनों की पूरी सूची लगभग वहीं समाप्त हो जाती थी।

मैंने पूछा, “अब?”

डॉक्टर साहब ने आलुओं की तरफ देखा और बोले, “अब क्या? खाना है।”

मामा ने कमान संभाल ली।

जो थोड़ा-बहुत सामान उपलब्ध था, उसमें उन्होंने आलू काटे और तलने की तैयारी करने लगे। उस समय मामा को देखकर मुझे लगा कि किसी यात्रा में सबसे उपयोगी आदमी वह नहीं होता जो योजना बनाता है, बल्कि कई बार वह होता है जो बिगड़ी योजना में भी खाना बना दे।

मैं और डॉक्टर साहब आसपास बैठे थे।

मैंने फिर शिकायत छेड़ी, “बड़ी अच्छी व्यवस्था थी ऊपर।”

डॉक्टर साहब ने बिना विचलित हुए कहा,

“देखो भाई, यहाँ रह रहे हो तो पाँच सितारा होटल वाली सुविधाएँ तो मिलने से रहीं। जो है, जितना है, उसी में काम चलाना पड़ेगा।”

मामा ने आलू पलटते हुए कहा, “हाँ, और व्यवस्था करने वाला खुद आलू ढूँढ रहा है।”

डॉक्टर साहब हँस पड़े।

“आलू भी व्यवस्था का ही हिस्सा हैं।”

उस एक वाक्य पर हम सब हँस दिए।

थोड़ी देर पहले तक जिस बात पर गुस्सा आ रहा था, अब वही मजाक बन चुकी थी।

आलू तैयार हुए।

सच कहूँ तो वे आलू स्वाद में कैसे थे, यह मुझे आज ठीक से याद नहीं। मगर उस रात वे किसी दावत से कम नहीं लगे। भूख, थकान और ठंड आदमी के स्वाद की परिभाषा बड़ी जल्दी बदल देते हैं।

हमने खाया।

फिर देर तक बातें होती रहीं।

कभी डॉक्टर साहब कोई किस्सा सुनाते, मामा बीच में उसे काटकर अपना संस्करण सुनाने लगते। कभी मैं दोनों की बात पर हँसता। कभी बाहर के अँधेरे की ओर ध्यान जाता और कुछ क्षण कमरे में चुप्पी भर जाती।

फिर कोई कुछ बोल देता।

रात कटती गई।

और आखिर हम सो गए।

---

सुबह आँख खुली तो ऐसा लगा जैसे रात की दुनिया और सुबह की दुनिया दो अलग स्थान हों।

जिस बिंदेसर ने रात को हमारा स्वागत अँधेरे, ठंड और बंद दरवाजों से किया था, वही सुबह बिल्कुल दूसरा दिखाई दे रहा था।

पहाड़ों पर हल्की धूप उतर रही थी। हवा अब भी ठंडी थी, पर उसमें रात वाला भय नहीं था। दूर तक फैली खामोशी अब डराती नहीं थी; उसमें एक शांति थी।

तभी हमें पता चला कि वहाँ एक बाबा भी रहते हैं।

पंडित जी से भी मुलाकात हुई।

उन्होंने पूछा हम लोग कहाँ रुके थे, कब पहुँचे और रात कैसे कटी। हमने भी अपनी पूरी कथा उन्हें सुना दी। उनके घर का जो सामान इस्तेमाल हुआ था, उसका हिसाब किया और पैसे दे दिए।

रात को जो स्थान अनजान था, सुबह उसी जगह के लोग अपने लगने लगे थे।

हमने नहाया-धोया और मंदिर के दर्शन के लिए गए।

सुबह के उस समय मंदिर के सामने खड़े होकर पिछली रात का जंगल कुछ दूर की बात जैसा लगने लगा। घंटियों की आवाज, ठंडी हवा और सामने पहाड़—इन सबके बीच आदमी थोड़ी देर के लिए अपनी शिकायतें भूल जाता है।

डॉक्टर साहब की “व्यवस्थाएँ” भी।

मामा की नाराजगी भी।

मेरी शिकायतें भी।

दर्शन के बाद हमने वापस लौटने की तैयारी की।

अब वही रास्ता उतरना था जिसे पिछली रात टॉर्च की एक लकीर के सहारे चढ़े थे।

दिन के उजाले में जंगल भी दूसरा लग रहा था।

हम तीनों कभी साथ चलते, कभी कोई आगे निकल जाता, कभी कोई पीछे रह जाता। कभी मामा और डॉक्टर साहब की बातचीत शुरू हो जाती, कभी दोनों चुप। बीच में मैं कुछ कह देता तो फिर कोई पुराना किस्सा निकल आता।

लेकिन उतरते समय मेरे मन में एक बात बार-बार आती रही।

हम तीनों ने पिछली रात एक ही रास्ता तय किया था।

घटनाएँ भी तीनों के लिए लगभग एक ही थीं।

पीठसैंण में देर हुई।

डॉक्टर साहब ने चलने की जिद की।

जंगल में अँधेरा हुआ।

टॉर्च निकली।

शेर और भालू का जिक्र आया।

रात दस बजे बिंदेसर पहुँचे।

व्यवस्था नहीं मिली।

एक अनजान कमरे में रात काटी।

मामा ने आलू तले।

सुबह मंदिर के दर्शन किए।

घटना एक ही थी।

मगर कहानी?

वह शायद तीन थी।

मामा के लिए संभव है यह डॉक्टर साहब की एक और जिद की कहानी रही हो—जिसमें समझदार आदमी को पीठसैंण में रुक जाना चाहिए था, मगर कुछ लोगों के कारण रात को जंगल नापना पड़ा।

डॉक्टर साहब के लिए शायद यह एक बिल्कुल सफल यात्रा रही हो—जहाँ पहुँचना था, पहुँच गए; जहाँ सोना था, सो गए; खाने को आलू मिले और सुबह दर्शन भी हो गए। फिर शिकायत किस बात की?

और मेरे लिए?

मेरे लिए शायद इन दोनों को देखते रहने की कहानी थी।

एक आदमी जो हर परिस्थिति में आगे बढ़ने का रास्ता खोज लेता था, भले ही उसकी “व्यवस्थाओं” की परिभाषा बाकी दुनिया से थोड़ी अलग हो।

और दूसरा आदमी जो उसे रास्ते भर सुनाता भी था, उसके साथ चलता भी था, रात को सबके लिए खाना भी बनाता था और अगली सुबह उसी के साथ मंदिर भी जाता था।

मामा और डॉक्टर साहब की नोक-झोंक उस दिन भी खत्म नहीं हुई थी।

आज भी शायद नहीं हुई होगी।

कुछ रिश्तों की मिठास शायद इसी में होती है कि उनमें थोड़ी खटास बची रहे।

हम पीठसैंण पहुँचे, अपनी गाड़ी ली और वापस थैलीसैंण आ गए।

यात्रा समाप्त हो गई।

पर कई साल बाद भी जब उस रात की याद आती है तो सबसे पहले बिंदेसर का मंदिर याद नहीं आता।

पहले डॉक्टर साहब की वह बड़ी टॉर्च याद आती है।

फिर उनका बड़े विश्वास से कहना—

“अरे, ऊपर सारी व्यवस्थाएँ हैं…”

फिर मामा का आलू तलना याद आता है।

और फिर वह सोलह किलोमीटर लंबा अँधेरा रास्ता।

तब लगता है कि यात्राएँ शायद जगहों की वजह से उतनी याद नहीं रहतीं, जितनी उन लोगों की वजह से जो हमारे साथ चलते हैं।

रास्ता एक ही होता है।

मगर साथ चलने वाला हर आदमी अपने भीतर उसकी अलग कहानी लेकर घर लौटता है।

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4 comments
@hemantmamgain

अरे खिचड़ी तो भूल गए तुम रात की।

@sunilduttpant

प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाय।........
“बिना काँटा-चम्मच के उस दिन आलू खाए।”😄🙏 Shandar jabardast Zindabaad .....chote

@mayanksuyal

खिचड़ी की बात अब पार्ट २ मे होगी मामा 😌

@mayanksuyal

डॉ साहब ज़िंदाबाद ! मामा जी ज़िंदाबाद !