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नंदा की विदाई — पहाड़ की सबसे खास यात्रा
Published 2 Sep 2026
नंदा की विदाई — पहाड़ की सबसे खास यात्रा
आज मैं आपका ध्यान उत्तराखंड की एक ऐसी बहुत प्रसिद्ध, आस्था और विश्वास से जुड़ी यात्रा की ओर ले जाना चाहती हूँ — नंदा देवी राजजात यात्रा। यह सिर्फ एक यात्रा नहीं है। यह एक बेटी की अपने मायके से विदाई की कहानी है।
उत्तराखंड के पहाड़ों में माँ नंदा को अपनी बेटी माना जाता है। लोग उन्हें देवी के साथ-साथ अपने घर की बेटी की तरह प्यार और सम्मान देते हैं। कहा जाता है कि नंदा देवी, माता पार्वती का ही एक रूप हैं। इसलिए पहाड़ के लोगों के लिए नंदा सिर्फ एक देवी नहीं, बल्कि उनकी अपनी नंदा हैं। नंदा की विदाई
नंदा देवी राजजात की शुरुआत नौटी गाँव से होती है। जब नंदा की डोली यात्रा पर निकलती है, तो ऐसा लगता है जैसे पूरा पहाड़ अपनी बेटी को उसके घर तक छोड़ने निकल पड़ा हो। लोग दूर-दूर से इस यात्रा में शामिल होने आते हैं। कोई पैदल चलता है, कोई सेवा करता है, कोई रास्ते में यात्रियों के लिए खाना-पानी रखता है।
कठिन रास्ते हैं, बारिश है, ठंड है, ऊँचे पहाड़ हैं — लेकिन लोगों का उत्साह कम नहीं होता। क्योंकि उनके लिए यह सिर्फ चलना नहीं है। यह अपनी बेटी के साथ चलना है। चार सींग वाला मेढ़ा
इस यात्रा की एक खास पहचान है — चार सींग वाला मेढ़ा, जिसे चौंसिंगा कहा जाता है।
मान्यता है कि यह नंदा के साथ यात्रा का एक खास हिस्सा होता है।
यात्रा के आखिरी पड़ाव पर पूजा के बाद इसे हिमालय की ओर छोड़ दिया जाता है।
मानो अब बेटी अपने नए घर की ओर चली गई हो।
बारिश और नंदा की विदाई| नंदा की विदाई से जुड़ी एक बहुत प्यारी लोकमान्यता भी है। कहा जाता है कि जब नंदा अपने मायके से विदा होती हैं, तो पहाड़ों में बारिश होती है। लोग मानते हैं कि यह नंदा के आँसू हैं। यह सिर्फ एक मान्यता है, लेकिन जब आप उस समय पहाड़ों में होते हैं और चारों तरफ बादल, बारिश और धुंध होती है, तो यह कहानी दिल को छू जाती है।
कहाँ तक जाती है यह यात्रा?
नौटी से शुरू होकर यह यात्रा पहाड़ों के कई गाँवों और ऊँचे रास्तों से गुजरती हुई होमकुंड तक जाती है। रास्ते में हरे-भरे जंगल, पहाड़ी गाँव, बुग्याल, ठंडी हवाएँ और चारों तरफ दिखाई देते पहाड़ — यात्रा को और भी खास बना देते हैं।
लेकिन इस यात्रा की सबसे खूबसूरत बात रास्ते नहीं हैं।
सबसे खूबसूरत है लोगों की आस्था।
आखिर इतनी खास क्यों है नंदा राजजात?
क्योंकि इसमें पूरा पहाड़ अपनी बेटी के लिए एक साथ खड़ा दिखाई देता है।
लोग अपनी परेशानियाँ भूलकर उसके साथ चलते हैं।
कोई उसे बेटी मानता है, कोई बहन और कोई माँ।
और शायद यही वजह है कि नंदा राजजात सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं लगती।
यह रिश्तों, प्यार और पहाड़ की संस्कृति की कहानी लगती है।
एक ऐसी बेटी की कहानी, जिसे पूरा पहाड़ प्यार करता है…
और हर बार उसकी विदाई पर कहता है—
“नंदा, फिर जल्दी आना।”
यही है नंदा देवी राजजात।
एक यात्रा, एक कहानी और पूरे पहाड़ की अपनी बेटी।
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