पाताल भुवनेश्वर: भोलेनाथ से इश्क़, मस्ती बेहिसाब!
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Patal Bhuvaneshwar, Uttarakhand 6 min read Dr. S. D. Pant 39 views
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पाताल भुवनेश्वर: भोलेनाथ से इश्क़, मस्ती बेहिसाब!

Published 22 Oct 2026

अगला पड़ाव — पाताल भुवनेश्वर

जहाँ हम धरती के भीतर उतरे और रहस्य हमारे भीतर उतरता गया…
हम गुफा के प्रवेश द्वार पर खड़े थे।
सामने धरती के भीतर जाती सीढ़ियाँ थीं। ऊपर सूर्य का प्रकाश था और नीचे से आती ठंडी हवा किसी अनदेखी दुनिया का निमंत्रण दे रही थी।
मयंक ने नीचे झाँकते हुए पूछा—
“पंत जी, आखिर यह गुफा इतनी गहराई में क्यों है?”
मामा ने तुरंत कहा—
“मुझे तो यह चिंता है कि इतनी गहराई में जाकर वापस ऊपर कौन आएगा!”
मैंने मुस्कुराकर कहा—
“ हम भगवान शिव के दर्शन करने जा रहे हैं, कोई किराए का मकान देखने नहीं।”
मयंक बोला—
“लेकिन सुना है कि इस गुफा का संबंध आदि गुरु शंकराचार्य से भी माना जाता है। आखिर इसके भीतर ऐसा क्या रहस्य है?”
मैंने कहा—
“शायद यही कि यहाँ शिव को देखने के लिए पहले धरती के नीचे उतरना पड़ता है।”
मामा बोले—
“तो क्या भगवान शिव ने ऊपर जगह नहीं मिलने के कारण नीचे निवास बना लिया?”
मयंक हँसते हुए बोला—
“मामा, भगवान को जगह की कमी थोड़े ही होगी।”

“सही कहा। शायद नीचे इसलिए कि मनुष्य जब नीचे उतरता है, तब उसका अहंकार भी थोड़ा नीचे आता है।”
मामा ने गंभीर होकर कहा—
“अच्छा दर्शन है… लेकिन सीढ़ियाँ फिर भी बहुत हैं।”
सुबह लगभग आठ बजे हम कुछ अन्य श्रद्धालुओं के साथ पहली टोली में गुफा के भीतर उतरने लगे।
एक-एक सीढ़ी नीचे जाती गई।
बाहर की रोशनी पीछे छूटती गई।
हवा ठंडी होती गई।
और कुछ ही क्षणों में ऐसा लगा जैसे हम केवल धरती के भीतर नहीं, बल्कि समय के भीतर प्रवेश कर रहे हों।
मयंक ने कहा—
“सोचो, कितने युगों से यह स्थान ऐसा ही होगा!”
मामा बोले—
“हाँ, और हम तीनों पहली बार आए हैं और अभी से विशेषज्ञों की तरह चर्चा कर रहे हैं।”
मैंने कहा—
“ज्ञान की शुरुआत प्रश्न से होती है।”
मामा बोले—
“और यात्रा की शुरुआत टिकट से।”
मयंक हँस पड़ा—
“मामा, आपका दर्शन हमेशा व्यावहारिक क्यों होता है?”
मामा बोले—
“क्योंकि पेट और पैर—दोनों अध्यात्म के महत्वपूर्ण अंग हैं।”
अंदर पहुँचते ही प्राकृतिक शिलाओं की अद्भुत आकृतियाँ दिखाई देने लगीं।
कहीं सहस्र पैरों वाले हाथी जैसी आकृति, कहीं काल भैरव की जिह्वा, कहीं चारों युगों से संबंधित शिलारूप, और मार्ग में शेषनाग की त्वचा जैसी संरचना।
मयंक हर आकृति को बड़ी जिज्ञासा से देख रहा था।
वह बोला—
“यह सब देखकर लगता है जैसे किसी ने पत्थरों में पूरी पौराणिक कथा लिख दी हो।”
मैंने कहा—
“यही तो इस स्थान की विशेषता है। प्राकृतिक शिलारूपों में मनुष्य को अपनी संस्कृति और पुराणों के प्रतीक दिखाई देते हैं।”
मामा बोले—
“मतलब पत्थर वही, देखने वाली दृष्टि अलग?”
मैंने कहा—
“बिल्कुल।”
मामा ने कहा—
“फिर तो मेरी दृष्टि में यह शिला समोसा भी हो सकती है।”
मयंक ने तुरंत कहा—
“मामा, आप जहाँ भी जाएँ, आपकी दृष्टि भोजन तक पहुँच ही जाती है।”
मैंने कहा—
“इसे भी एक प्रकार की साधना समझो—मामा का मन विषय से हटकर सीधे भोजन में स्थिर हो जाता है।”
तीनों हँस पड़े।
पुरोहित जी हमें धीरे-धीरे गुफा के भीतर ले जा रहे थे।
गुफा की संकरी संरचना, मंद प्रकाश और चारों ओर दिखाई देती प्राकृतिक आकृतियाँ वातावरण को रहस्यमय बना रही थीं।
मयंक ने धीमे स्वर में कहा—
“ऐसा लगता है जैसे गुफा के भीतर प्रवेश करते ही बाहर की दुनिया पीछे छूट गई।”
मैंने कहा—
“शायद यही इस यात्रा का पहला संदेश है—बाहर से भीतर की ओर।”
पुरोहित जी धीरे-धीरे हमें भीतर ले जा रहे थे।
फिर एक स्थान पर वे रुके।
सामने शिवलिंग के दर्शन हुए।
गुफा की दीवार पर शंकर और पार्वती की आकृतियाँ दिखाई दीं।
गुफा की छत से बूँद-बूँद जल शिवलिंग पर गिर रहा था। लगा—अभिषेक बाहर नहीं, भीतर हो रहा है; बूंद और शिवलिंग अलग दिखाई देते हैं, पर सत्य में दोनों उसी एक तत्त्व के हैं।
हम तीनों कुछ क्षणों तक बिल्कुल शांत रहे।
मयंक ने धीरे से कहा—
“यह दृश्य सच में अद्भुत है।”
मामा ने हाथ जोड़ लिए।
उनकी आवाज़ इस बार बिल्कुल गंभीर थी—
“कुछ स्थानों पर शब्द अपने आप छोटे हो जाते हैं।”
मैंने शिवलिंग की ओर देखते हुए कहा—
“और मन बड़ा।”
गुफा में जल की ध्वनि थी।
मंत्रों की गूँज थी।
और एक ऐसी शांति थी जिसे शब्दों में बाँधना कठिन था।
हमने वहीं श्रद्धापूर्वक शिव मानस पूजा का पाठ किया—

रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं
नानारत्नविभूषितं मृगमदामोदाङ्कितं चन्दनम्।
जातीचम्पकबिल्वपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथा
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम्॥

फिर हमने सामूहिक रूप से उच्चारण किया—
आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं।
पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः॥
सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो।
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्॥

मंत्रों की ध्वनि गुफा की दीवारों से टकराकर वापस आ रही थी।
ऐसा लगा जैसे हम मंत्र नहीं बोल रहे थे—
गुफा स्वयं हमारे साथ उनका उच्चारण कर रही थी।
उस क्षण मन में एक ही भाव आया—
“जो कुछ मैं करता हूँ, वह सब शिव को समर्पित हो।”
यही शायद शिव मानस पूजा का सबसे गहरा संदेश है।
धीरे-धीरे हम वापस ऊपर की ओर चलने लगे।
नीचे जाते समय हमारे मन में प्रश्न थे।
ऊपर आते समय उन प्रश्नों की जगह एक विचित्र शांति थी।
मयंक बोला—
“पंत जी, क्या आपको लगता है कि हमने गुफा का रहस्य समझ लिया?”
मैंने कहा—
“रहस्य समझ लिया जाए तो वह रहस्य नहीं रहता। कुछ चीज़ें केवल अनुभव की जाती हैं।”
मामा बोले—
“मैंने एक रहस्य अवश्य समझ लिया है।”
हम दोनों ने पूछा—
“क्या?”
मामा बोले—
“धरती के भीतर जाने के लिए साहस चाहिए और बाहर आने के लिए घुटनों की कृपा।”
मयंक जोर से हँस पड़ा।
मयंक ने कहा—
“मामा, आज आपने भी अपनी एक आध्यात्मिक उपलब्धि प्राप्त कर ली।”
मामा बोले—
“हाँ—मैंने जान लिया कि मोक्ष की सीढ़ियाँ बहुत लंबी हैं।”
हम तीनों हँसते हुए बाहर आ गए।
बाहर सूर्य का प्रकाश फिर हमारे सामने था और पीछे मुड़कर गुफा को देखा।
मन में लगा—
हम पाताल भुवनेश्वर में शिव का रहस्य खोजने गए थे,
लेकिन लौटते समय लगा कि असली यात्रा गुफा की नहीं, स्वयं के भीतर की थी।
धरती के नीचे उतरना सरल था…
अपने भीतर उतरना कठिन।
और शायद शिव-कृपा यही है—
जब बाहर का मार्ग अंधकारमय हो, तब भीतर का प्रकाश दिखाई देने लगे।
मामा ने अचानक पूछा—
“अब कहाँ चलना है?”
मयंक बोला—
“जहाँ यात्रा ले जाए।”
मामा ने कहा—
“ठीक है, लेकिन अगला स्थान ऐसा हो जहाँ दर्शन भी हों और पैर भी सुरक्षित रहें।”
मैंने हँसते हुए कहा—
“चलो भ्राता श्री, शिव-कृपा में सीढ़ियाँ भी प्रसाद हैं।”
मामा बोले—
“तो फिर प्रसाद थोड़ा कम ही देना!”
हम तीनों की हँसी पहाड़ी हवा में फैल गई।

हर हर महादेव। 🔱

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